हनुमत् स्तुति

बजरंगी राम पुकारो हे महाबीर हुंकरो।
तृप्ती दो भक्त विकल को।
मत भूलो अपने बल को।।

हे पवनपुत्र! अंजनीलाल कहा खोये सुध बिसराये।
जरा याद करो उस पौरुष को जिससे महाबीर कहाये।
किल-किला शब्द से बजरंगी दहला दो सृष्टि सकल को।
मत भूलो अपने बल को।।

दिनकर को समझ के कन्दुक कपि बचपन में की थी क्रीड़ा।
मुनिवर के श्राप से ग्रसित हुये भूले निज बल महाबीरा।
तुमने गौरव के योग्य किया बज्रांग सकल कपि दल को।
मत भूलो अपने बल को।।

श्री राम का सखा बना करके सुग्रीव को अभय दिलाये।
माँ सीता की खोज किया अक्षय का क्षय कर आये।
एक छलांग मे लाँघ गये सत जोजन वरिधि जल को।
मत भूलो अपने बल को।।

प्रभु राम भक्ति का गान किया सुख दीन्हा सीता माँ को।
अष्ट सिद्धि नौ निधि पायी किया राख स्वर्ण लंका को।
था सुरसा को दिखलाया कपि अपने अतुलित कौशल को।
मत भूलो अपने बल को।।

हे भक्तश्रेष्ठ तेरा रोम-रोम श्री राम नाम गुन गाये।
अपने सीने को फाड़ के तुमने सियाराम दिखलाये।
तुम राम भक्त हम तेरे भक्त, भक्ती दो मुझ विह्वल को।।
मत भूलो अपने बल को।।

तेरा नाम मात्र ही भूत-प्रेत भव-बाधा दूर भगाये ।
हम दीन हीन जड़ कामी प्रभु अब शरण तुम्हारी आये।
भव सागर से पार करो हनुमान ‘अनिल’ निर्बल को।
मत भूलो अपने बल को।।

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