जिस दिन तुमसे उल्फत का इरादा कर लिया मैंने।
उसी दिन मजनूं बनने का भी वादा कर लिया मैंने।।
नही कुछ फर्क पड़ता मुझको ताली और गाली से।
कि इस महफिल में अपना दर्द आधा कर लिया मैंने।।
वो लम्हे चंद जो भी संग में तेरे गुजारे हैं ।
मुकद्दर के सिकंदर का भी माद्दा कर लिया मैंने।।
रुबाई मरे गीतों की लबों तक उनके पहुची है।।
सफ़र मंजिल से भी कुछ और ज्यादा कर लिया मैंने।।
बड़ी रंगीनियाँ देखी बहुत रुसवाइयाँ झेली।
मकां को अपने मन्दिर से भी सादा कर लिया मैंने।।
नहीं कुछ फर्क बचता जब चरम पर प्रेम जाता है।
कभी तो तुमको मोहन खुद को राधा कर लिया मैंने।।