हम उन्हें याद ना आयें कहां ये मुमकिन है!

हम उन्हें याद ना आयें कहां ये मुमकिन है
पर वो यह राज बतायें कहां ये मुमकिन है॥

लम्हा-लम्हा थिरकता आँखो में मेरा चेहरा
मगर किसी को दिखायें कहां ये मुमकिन है॥

याद कुछ करके हंसी होठों में सिमटा देते
क्यों है यह हाल सुनायें कहां ये मुमकिन है॥

नाम जो लेते हैं अक्सर किसी बहाने से
नाम किसका है बतायें कहां ये मुमकिन है॥

आँख नम होती है जो गर कभी तन्हाई में
चैन भर रोने को पायें कहां ये मुमकिन है॥

महकता है मेरे दिल में जो कुसुम उल्फत का
अनिल को भूल वो जायें कहां ये मुमकिन है॥

Written on 16/02/2002 Saturday Mumbai

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