बनके दुल्हन मेरी उल्फ़त मुझे ख्वाबों में मिली।
तेरी तस्वीर जो बरसों मे किताबों में मिली।।
वक़्त के अक्स से जो हाले-दिल ने पूछा था।
जो सवालों मे रही आज जबाबों में मिली।।
कुछ अजीब कश-मकश मे गुजरा ये सफ़र चाहत का।
मिली जब भी मुझे खुशियाँ तो अजाबों मे मिली।।
कोई नजराना भला इससे क्या बेहतर होगा।
चांदनी मुझको मिली भी तो नकाबों में मिली।।