आदमी

एक बार हमने देखा एक ख्व़ाब आदमी का
कैसे हसींन जलवे दिखाता है आदमी।
कभी किसी को चैन से जीने नहीं देता
खुद आदमी को मार गिराता है आदमी।।

एक बार किसी चीज़ को अपना समझ ले तो
फिर जान उसके पीछे गंवाता है आदमी।
सौंप दे अनिल कोई साम्राज्य स्वर्ग का
फिर भी कभी ना चैन से रह पाता आदमी।।

इसकी मेहरबानियों की क्या मिसाल दूँ
पत्थर को भी भगवान बनाता है आदमी।
जाने कैसी हैवानियत होती मगर इसमें
इन्सान को शैतान बनाता है आदमी।।

किसी की क्या मज़ाल जो इसका बुरा भी सोच ले
पर अपनी मुश्किल आप बनाता है आदमी।
दौलत के ख़ातिर बेंच दे ईमान धरम भी
अपनी नजर में खुद को गिराता है आदमी।।

Written by Anil Mishra in 1997.

Leave a Reply